Friday, 3 January 2014

MY First story , I am neither a story-writer nor a writer at all. I will feel better if u wl read it.
(ये मेरी पहली कहानी है , आप अगर पढ़ेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा ! मैं कोई कहानीकार नहीं हूँ बस गाहे -बगाहे दिल को तस्सली देने के लिए कभी -कभी लिख लेता हूँ !)
जब से होश सम्भाला तभी से उनका बस एक ही नाम सुना था -डायन दादी ! बचपन से तोतली जबान पे जो आया वही बस रह गया उनके मरने तक !सबसे पहले उनका ये नाम अपनी बुआ के मुँह से सुना था ! गावं में नया -नया मोबाइल फोन वाला दौर आया ही था , मेरी माँ फोन पे बुआ को बता रही थी कि जानती हैं दीपू के पापा दो दिन से काम पर नहीं गए हैं ! फोन रखते ही माँ कहने लगी कि "दीपू , अरे दीपूवा जाके जल्दी से ओझाइन चाची के बुला के ले आ , और सुन शम्भू चाचा के दुकान से दू रुपइया के सुखा लाल मिर्च भी ले लेना !"पांच का नोट हाँथ में मिलते ही हम हेलीकाप्टर हो गए , जब तक ओझाइन चाची के घर पहुंचे तब तक यही कैलकुलेशन बैठाते रहे कि पांच के नोट में से दू गो मॉर्टिन चॉकलेट का जुगाड़ कैसे निकालें ! ओझाइन चाची हमारे गावं के लिए बिलकुल वैसे ही थीं जैसे अटल जी के घुटने के ऑपरेशन के लिए डॉ चितरंजन राणावत ! जोड़ों का दर्द हो या कमर में चमक , ओझाइन चाची के अलावा कोई दूसरा नाम ही नहीं था गाँव के लोगों के लिए और डायन , भूत -प्रेत के लिए तो मतलब समझिये कि दूसरे हनुमान चालीसा !

खैर ओझाइन चाची के मेरे घर में आते ही पापा कि तबियत कितनी ठीक हुई नहीं कह सकता पर हाँ लाल मिर्च कि वो ढांस और उससे पैदा हुई खांसी आज तक जेहन में है ! जाते -जाते माँ को बोल गईं , दुल्हिन अगर सब कुछ बढ़िया देखने कि इच्छा है तो सबसे पहले उ डायन के अपना घर आवे जाये पर पाबन्दी लगा दो ! और बस वही हुआ , अब वो बुढ़िया दरवाज़े पे खड़ी होकर या तो दीपू(यानि कि मेरे ) कि माँ पुकारती या रामचरण ये रामचरण ! जब साँसे फूलने लगती तो हिम्मत हारकर आस रखे हुए दरवाज़े पे बैठ जाती, पर दरवाज़ा ज्यों का त्यों छिटकनी के सहारे चिपका रहता ! साला ससे दुखद बात ये थी कि इस डायन -कोकाईन के चक्कर में अपना बाहर निकलना बंद हो गया था ! दोस्त गुल्ली -डंडे उड़ाते और हम घर में लाल मिर्च कि ढांस!

माँ ने एक बार बताया था कि घर में बियाह कर आते ही अपनी मर्द को खा गयी थी, अब अबोध मन ये तो नहीं समझ पाया था कि कैसे कोई औरत अपने पति को खा सकती है पर माँ तो फिर माँ है जो बता दिया वही सच , उससे कैसा जवाब सवाल !बड़े दिनों बाद दसहरे पर जब इस बार गावं जाने का मौका मिला तो थोडा कौतुहल भी हुआ और थोड़ी चिंता भी ! वहाँ लोग बजे ही कैसे सो जाते होंगे , फेसबुक वगैरह के बिना जीवन कैसा होता होगा इत्यादि -इत्यादि !खैर गावं पहुँचते ही बड़ा सुकून सा लगा , बात बात पे ठठा -ठठा कर हंसने वाले लोगों कि ज़िन्दगी में बेशक हमसे संसाधन कम हैं पर सुकून ज्यादा !

सप्तमी का दिन था , माँ जदु काका से घर लिपवा रही थीं तभी छुटकी हांफती हुई आई और बिना सांस भरे कहने लगी "अरे चाची डायन दादी का न सांस चढ़ रहा है , अवध चाचा तो उनको बछ्ड़ा भी छुवा दिए , लगता है अब चाँद मिनटों कि मेहमान हैं !" तभी पड़ोस वाली पाठक चाचा कि औरत भोजपुरिआ टोन में बोल पड़ी , हे दुर्गा माई , जाये द बड़ी दिन बाद गावं के आदमी के गुहार सुनल !ठीक भइल न तो अभी कितने के खैतिन "! घर चूँकि पास में ही था , मैं वहाँ पहुंचा तो देखा पाठक चाचा के औरत कि गुहार दुर्गा माता ने सचमुच सुन ली थी ! डायन दादी अब इस दुनिया में नहीं थी ! गाँव के छोटे से कस्बे से महानगर में आये हुए इतने सालों में जब भी टेलीविज़न पर , अखबार में ये समाचार देखता -पढता हूँ कि डायन बता कर मार डाला , ज़िंदा जला डाला , पति ने शक कि बिनाह पे पत्नी के टुकड़े -टुकड़े कर दिए तो मन फ़्लैशबैक में चला जाता है ! अंतर्मन कहता है अगर उसी समय माँ से पूछ लिया होता कि माँ लड़की के घर में बियाह कर आते ही अगर दुर्भाग्यवश उसके पति कि मृत्यु हो जाये तो उसके लिए पत्नी को डायन बता कर प्रताड़ना देना कहाँ का न्याय है ? समाज ने हमें अपनी ज़िन्दगी बेहतर और सरल करने के लिए नियम बनाये हैं या रूढ़िवादिता का एक सर्पपाश जिसमे सब लोग फंसे हुए हैं ! डायन दादी कि कथा इस रूढ़िवादी भारत में लाखों औरतों कि कथा है , इसलिए अपने आस पड़ोस में कोई भी डायन दादी दिखे तो अपनी माँ से तुरंत सवाल कीजिये !
(शुभ रात्रि - रात बहुत हो गई है और सुबह रोज़ी -रोटी के जुगाड़ में कार्यालय भी जाना है , आपका अवनीश )