Saturday, 14 September 2013


पिछले कुछ दिनों में दोनों सम्प्रदायों के कई ऐसे दोस्तों से बात हुई की जो मुझे इस मुज़फ्फरनगर के दंगे को सही ठहराते मिले !कोई कह रहा था कि नहीं ये जरूरी था होना , जब से उत्तरप्रदेश में अखिलेश कि सरकार आई तब से मुस्लिमो का मन बहुत बढ़ गया था इसलिए ये हुआ ! कोई कह रहा था हम तो अल्पसंख्यक हैं इसलिए हमें परेशां किया जा रहा है ! काहे का मुस्लिम का मन बढ़ना भाई और काहे के तुम अल्पसंख्यक ! दोनों तरफ के लोगों को मैं जवाब देता हूँ , अगर हिम्मत है तो जबाब देकर बताना !सियासत जो चाहता है वही करते हो फिर भी सियासत को गाली देते हो ! दोनों तरफ के मूर्खों संभल जाओ और गर नहीं तो मेरा जवाब सुनो -
"
तुम्हारी माँ ने क्या कभी अपने लाल खोए हैं
घर वाले छाती पीट-पीट के क्या कभी रोए हैं
गाँव के गाँव दहशत में जाग रहे ,
कुत्ते सड़कों पे चैन की नींद सोए हैं !
कभी तेरे बहनों की राखी टूटी है , भाई की किस्मत फूटी है
नई-नवेली दुल्हन की क्या कभी ऐसे चूड़ियाँ टूटी हैं
मुझे मालुम है इन सब का उत्तर "नहीं " है ,
तभी कहते हो दोस्त की ये दंगा सही है !
(अवनीश )!






"जिसकी वफादारी के किस्से मैंने बरसों यारों में सुनाएं
आज उसे बेवफा कह भी दूँ , तो यकीं कौन करेगा
महताब देख कर उसे महबूब कह देने वाला मैं ही था
अब अगर उसे मामूली सी सूरत कह दूँ , तो यकीं कौन करेगा !
यक़ीनन यकीं वही होता है दुनियां को ,जो बरसों सुनाया जाये
गीत वही गाती सारी दुनिया , जिसे हर लब पे गुनगुनाया जाये
बिछड़ कर हम तुम अकेले -अकेले जी रहे ,हम दोनों जानते हैं
ये छोटी सी बात सरे -बज्म बताई  जाये , तो यकीं कौन करेगा !
अपने इश्क पे यकीं करूँ, या उसको झूठा कहूँ
तुझ बिन खुद को बेसब्र कहूँ , या अन्दर से टूटा-फूटा कहूँ
उलफ़त के इस मारे का जख्म भला अब कौन भरेगा
आज तुझे बेवफा कह भी दूँ तो यकीं कौन करेगा !
(आपका अवनीश )