"जिसकी वफादारी के किस्से मैंने बरसों यारों में सुनाएं
आज उसे बेवफा कह भी दूँ , तो यकीं कौन करेगा
महताब देख कर उसे महबूब कह देने वाला मैं ही था
अब अगर उसे मामूली सी सूरत कह दूँ , तो यकीं कौन करेगा !
यक़ीनन यकीं वही होता है दुनियां को ,जो बरसों सुनाया जाये
गीत वही गाती सारी दुनिया , जिसे हर लब पे गुनगुनाया जाये
बिछड़ कर हम तुम अकेले -अकेले जी रहे ,हम दोनों जानते हैं
ये छोटी सी बात सरे -बज्म बताई जाये , तो यकीं कौन करेगा !
अपने इश्क पे यकीं करूँ, या उसको झूठा कहूँ
तुझ बिन खुद को बेसब्र कहूँ , या अन्दर से टूटा-फूटा कहूँ
उलफ़त के इस मारे का जख्म भला अब कौन भरेगा
आज तुझे बेवफा कह भी दूँ तो यकीं कौन करेगा !
(आपका अवनीश )

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