देश बहुत गुस्से में है , हर जगह एक ज्वालामुखी सी फूट पड़ी है और फूटनी चाहिए भी ! उन दरिंदों के लिए फांसी ही एक मात्र सजा है और उनकी बेशर्म , बेगैरत दरिन्दे जाति के और लोगों को पता भी चलना चाहिए की इतने बड़े गुनाह की सजा कितनी बड़ी हो सकती है ! पर मुझे थोड़ी सी चिंता इस बात को लेकर है की क्या फांसी दे देने से बलात्कार होने बंद हो जायेंगे ! पूरे देश के इतने गुस्से में होने के बाद भी आज मऊ में फिर से बलात्कार हुआ है ! मेरी सोच ये कहती है की ये बलात्कार और बलात्कारी सृष्टी के कई नियमों के साथ साथ जो पूरी मनुष्य जाती ने छेड़ छाड़ की है उसका भी परिणाम है ! बाजारवाद , स्त्री को सिर्फ एक देह समझना , भोग की वस्तु समझना , भौतिकवाद सारे इस समस्या की जड़ हैं ! बलात्कार की कोई भी न्यूज़ किसी भी चैनल पे देखिये उसके बाद गिन के चार विज्ञापन (Advertisement) देखिये , बॉडी स्प्रे , मिथुन कोंडोम , सुंदरी कैटरीना वाली माजा पेय पदार्थ (maaza cold drink )आदि -आदि ,सारे बस और बस यही दिखाते हैं की नारी एक शरीर मात्र है , देह मात्र है जो अपने देह मात्र से भावनाओं को उतेजित कर के सफलता हासिल कर सकती है ! आज के दौर में थोड़ी बहुत समस्या पुरुष जाति के पास भी है की अब वो किस नारी की पूजा करे , उस नारी की जिसके लिए उसकी मर्यादा , उसका संस्कार , उसकी इज्जत इतना महत्व रखती थी की उस अहिल्या को छूने से पापी डरते थें की कहीं भस्म न हो जाऊ !पुरुष के साथ साथ अब नारी जाती को भी ये सोचना होगा की उनसे चूक कहाँ हुई ! हांथों में लाल मिर्च का पाउडर और ब्लेड की जगह क्या होना चाहिए जिससे पापी रावण को भी सोचना पड़े की महीनों अशोक वाटिका में सीता को रख तो सकते हैं पर छू नहीं सकते , क्यूंकि डर सीता से नहीं सीता की मर्यादा पालन और उसकी शक्ति से है ! मुझसे कल किसी ने कहा की लगभग हर एक लड़के के अन्दर एक बलात्कारी छिपा हुआ है , जो भावनाओं के माध्यम से , प्यार जता के एक लड़की के साथ हमबिस्तर होना चाहते हैं पर माफ़ करना बहिन , इस प्यार का बाज़ार लगाने के लिए जितना पुरुष जिम्मेदार है उतना ही स्त्री भी ! भावनाओं और संवेदनाओं के साथ समय के साथ खेलना दोनों पक्षों ने सीख लिया है ! आशा है बहिन तुम मेरी बातों का सही अर्थ निकल पाओगी ! जयशंकर प्रशाद ने कभी कहा था - अबला नारी तुम्हारी यही कहानी , आँचल में है दूध आँखों में है पानी ! पर जब न आँचल रहा , न उसमे दूध और न ही आँखों में पानी और दो बच्चों की माँ होने पर भी न मांग में सिंदूर तब शायद प्रकृति के नियम टूटने लगे ! स्कूल ,कॉलेज, बार और ऑफिस की कैंटीन में सिगरेट के छले उड़ाते हुए अपने पुरुष मित्रों की टोली के नॉन वेज जोक्स पे जब आप अपना ताल ठोकती हैं तब एक बात आप जरुर याद रखना की कमोबेश पुरुष आज भी तुमसे वही करुणा , वही इज्जत , वही मर्यादा , वही संवेदना चाहता है जिसकी बदौलत तुम अहिल्या थी , दुर्गा थी , काली थी , अनुसूया थी और प्रसाद ने कहा था की -
"नारी तुम केवल श्रधा हो , विश्वास रजत पग तल में
पियूष श्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में "
(ये मेरे अपने विचार हैं , आप इससे सहमत या असहमत हो सकते हैं , अपनी प्रतिक्रिया खुल कर दे सकते हैं - आपका अवनीश !)
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