Saturday, 22 December 2012

तुम्हें सजने सवरनें का बहुत शौक था
    और मुझे तुम्हारे  प्यार में जलते रहने का ,
तुम सजती रहो , संवरती रहो
              और मैं खुद को जलाता रहूँगा
तुमने मुझे पाकर खो दिया है
         पर मैं तुम्हें खो कर भी पाता  रहूँगा !
कभी पापा के लिए , कभी मम्मी के लिए
कभी खुद के लिए ठुकराया है तुमने मुझे
      अब मैं तुम्हें
हर घड़ी , हर पल ठुकराता रहूँगा ,
तुम्हें खो कर भी पाता रहूँगा !
तितली का फड़फडाना , कोयल का कूकना
      भौरों का गुनगुनाना और मेरा दर्द में भी मुस्काना
ये तमाम चीज़ें गवाह हैं इस बात की
       की प्यार , इश्क सब समपर्ण का ही दूसरा नाम है
ये गीत मैं ताउम्र अपने होंठों से गाता रहूँगा
      प्रिये ! मैं तुम्हें खो कर भी पाता रहूँगा !
(ये कविता प्यार में खुद्दारी के लिए लिखी है , इसे कृपा कर के मेरा अहंकार न समझे ! किसी की याद में , किसी के लिए लिखी हुई ये कविता , आपका अवनीश !)
     

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