Saturday, 23 August 2014

कौन हो तुम
मेरे अनकहे प्रश्नों का जवाब
सुकून भरी नींद या सुनहरा ख्वाब
कौन हो तुम ?
थकन की दवा हो
या मज़ार की दुआ
जाड़े की गुनगुनी धूप हो
या सर्द की सुबह में आग का धुआं
कौन हो तुम ?
भौरों की गुनुनाहट हो
या फूलों की ताज़गी
जीते -जी मेरी मौत का कारण हो
या फिर मेरी ज़िन्दगी
कौन हो तुम ?
कुछ प्रश्न उलझे से हैं
छोड़ों न प्रश्नों में क्या रखा है
चलो , गले में बाहें डालो
मुझे देखो, प्यार करो
प्रश्न अपने आप सुलझ जायेंगे !
जरुरी नहीं है हर बार प्रश्नों का सुलझना
कुछ प्रश्न वैसे उलझे ही अच्छे लगते हैं
जैसे सावन की बारिश में भीगने के बाद तुम्हारे घने लट !
(अवनीश )

Friday, 3 January 2014

MY First story , I am neither a story-writer nor a writer at all. I will feel better if u wl read it.
(ये मेरी पहली कहानी है , आप अगर पढ़ेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा ! मैं कोई कहानीकार नहीं हूँ बस गाहे -बगाहे दिल को तस्सली देने के लिए कभी -कभी लिख लेता हूँ !)
जब से होश सम्भाला तभी से उनका बस एक ही नाम सुना था -डायन दादी ! बचपन से तोतली जबान पे जो आया वही बस रह गया उनके मरने तक !सबसे पहले उनका ये नाम अपनी बुआ के मुँह से सुना था ! गावं में नया -नया मोबाइल फोन वाला दौर आया ही था , मेरी माँ फोन पे बुआ को बता रही थी कि जानती हैं दीपू के पापा दो दिन से काम पर नहीं गए हैं ! फोन रखते ही माँ कहने लगी कि "दीपू , अरे दीपूवा जाके जल्दी से ओझाइन चाची के बुला के ले आ , और सुन शम्भू चाचा के दुकान से दू रुपइया के सुखा लाल मिर्च भी ले लेना !"पांच का नोट हाँथ में मिलते ही हम हेलीकाप्टर हो गए , जब तक ओझाइन चाची के घर पहुंचे तब तक यही कैलकुलेशन बैठाते रहे कि पांच के नोट में से दू गो मॉर्टिन चॉकलेट का जुगाड़ कैसे निकालें ! ओझाइन चाची हमारे गावं के लिए बिलकुल वैसे ही थीं जैसे अटल जी के घुटने के ऑपरेशन के लिए डॉ चितरंजन राणावत ! जोड़ों का दर्द हो या कमर में चमक , ओझाइन चाची के अलावा कोई दूसरा नाम ही नहीं था गाँव के लोगों के लिए और डायन , भूत -प्रेत के लिए तो मतलब समझिये कि दूसरे हनुमान चालीसा !

खैर ओझाइन चाची के मेरे घर में आते ही पापा कि तबियत कितनी ठीक हुई नहीं कह सकता पर हाँ लाल मिर्च कि वो ढांस और उससे पैदा हुई खांसी आज तक जेहन में है ! जाते -जाते माँ को बोल गईं , दुल्हिन अगर सब कुछ बढ़िया देखने कि इच्छा है तो सबसे पहले उ डायन के अपना घर आवे जाये पर पाबन्दी लगा दो ! और बस वही हुआ , अब वो बुढ़िया दरवाज़े पे खड़ी होकर या तो दीपू(यानि कि मेरे ) कि माँ पुकारती या रामचरण ये रामचरण ! जब साँसे फूलने लगती तो हिम्मत हारकर आस रखे हुए दरवाज़े पे बैठ जाती, पर दरवाज़ा ज्यों का त्यों छिटकनी के सहारे चिपका रहता ! साला ससे दुखद बात ये थी कि इस डायन -कोकाईन के चक्कर में अपना बाहर निकलना बंद हो गया था ! दोस्त गुल्ली -डंडे उड़ाते और हम घर में लाल मिर्च कि ढांस!

माँ ने एक बार बताया था कि घर में बियाह कर आते ही अपनी मर्द को खा गयी थी, अब अबोध मन ये तो नहीं समझ पाया था कि कैसे कोई औरत अपने पति को खा सकती है पर माँ तो फिर माँ है जो बता दिया वही सच , उससे कैसा जवाब सवाल !बड़े दिनों बाद दसहरे पर जब इस बार गावं जाने का मौका मिला तो थोडा कौतुहल भी हुआ और थोड़ी चिंता भी ! वहाँ लोग बजे ही कैसे सो जाते होंगे , फेसबुक वगैरह के बिना जीवन कैसा होता होगा इत्यादि -इत्यादि !खैर गावं पहुँचते ही बड़ा सुकून सा लगा , बात बात पे ठठा -ठठा कर हंसने वाले लोगों कि ज़िन्दगी में बेशक हमसे संसाधन कम हैं पर सुकून ज्यादा !

सप्तमी का दिन था , माँ जदु काका से घर लिपवा रही थीं तभी छुटकी हांफती हुई आई और बिना सांस भरे कहने लगी "अरे चाची डायन दादी का न सांस चढ़ रहा है , अवध चाचा तो उनको बछ्ड़ा भी छुवा दिए , लगता है अब चाँद मिनटों कि मेहमान हैं !" तभी पड़ोस वाली पाठक चाचा कि औरत भोजपुरिआ टोन में बोल पड़ी , हे दुर्गा माई , जाये द बड़ी दिन बाद गावं के आदमी के गुहार सुनल !ठीक भइल न तो अभी कितने के खैतिन "! घर चूँकि पास में ही था , मैं वहाँ पहुंचा तो देखा पाठक चाचा के औरत कि गुहार दुर्गा माता ने सचमुच सुन ली थी ! डायन दादी अब इस दुनिया में नहीं थी ! गाँव के छोटे से कस्बे से महानगर में आये हुए इतने सालों में जब भी टेलीविज़न पर , अखबार में ये समाचार देखता -पढता हूँ कि डायन बता कर मार डाला , ज़िंदा जला डाला , पति ने शक कि बिनाह पे पत्नी के टुकड़े -टुकड़े कर दिए तो मन फ़्लैशबैक में चला जाता है ! अंतर्मन कहता है अगर उसी समय माँ से पूछ लिया होता कि माँ लड़की के घर में बियाह कर आते ही अगर दुर्भाग्यवश उसके पति कि मृत्यु हो जाये तो उसके लिए पत्नी को डायन बता कर प्रताड़ना देना कहाँ का न्याय है ? समाज ने हमें अपनी ज़िन्दगी बेहतर और सरल करने के लिए नियम बनाये हैं या रूढ़िवादिता का एक सर्पपाश जिसमे सब लोग फंसे हुए हैं ! डायन दादी कि कथा इस रूढ़िवादी भारत में लाखों औरतों कि कथा है , इसलिए अपने आस पड़ोस में कोई भी डायन दादी दिखे तो अपनी माँ से तुरंत सवाल कीजिये !
(शुभ रात्रि - रात बहुत हो गई है और सुबह रोज़ी -रोटी के जुगाड़ में कार्यालय भी जाना है , आपका अवनीश )

Monday, 16 December 2013

सिक्के के दो पहलु होते हैं , हो सकता है किसी एक पहलु ने किसी समय पे अपनी नीचता दिखाई हो पर इसका मतलब ये कदापि नहीं कि सिक्के का दूसरा पहलू हमेशा सच्चा और निर्णायक हो ! द्रौपदी के चीर -हरण पर भी सभा में बहुतों ने आँखें गीली कि थीं पर उन में कई दुर्योधन के मित्र पहले भी थें और बाद में भी बने रहें ! रात को किटी -पार्टी कीजिये , शराब के नशे में बीवी -बेटी सबको धो डालिये , और १६ दिसंबर आते ही निर्भया , दामिनी और पता नहीं क्या क्या के लिए आंसू बहाइये !बढ़िया है , समाज बदल जायेगा , देखिये कब तक -- मित्र विष्णु नारायण सिंह के वाल से साभार कुछ पंक्तियाँ !
पुरुष हवशी थे, जानवर है
स्त्री कहाँ कभी बस झूठी भी हो पाई थी ?!
आधे से ज्यादा जो पैरोकारी में है लगे
खोखले है, इलज़ाम और जुर्म में फर्क इन्हें दिखता नहीं
जब तक इलज़ाम खुद पर आ ना जाये
अंध-पैरोकारी का अंजाम कोई सीखता नहीं
जो पुरुष वासना में जल कर हो मर रहा
उसकी चिता सजाओ तुम
पर ज़रा उस स्त्री को भी अपनी सभा में खींच लाओ तुम
निर्भया की अंत्येष्टि पर जिसने अपने स्वार्थ की खीर पकाई है
ऐ पैरोकारों निवेदन तुमसे
निर्भया का शोक मनाओ,
जो ऐसे दरिन्दे कहीं मिल जाए
चमड़ी उधेड़ चौक टंगवाओं
पर जहाँ इल्जामों का खेल हो
वहां सुनो दोनों पक्षों की बात
पुरुष निकृष्ट, नीच, अधम
उसको भगवान ना मान लो
पर स्त्री भी हो सकती झूठी
इतना भी तुम जान लो !

Saturday, 14 September 2013


पिछले कुछ दिनों में दोनों सम्प्रदायों के कई ऐसे दोस्तों से बात हुई की जो मुझे इस मुज़फ्फरनगर के दंगे को सही ठहराते मिले !कोई कह रहा था कि नहीं ये जरूरी था होना , जब से उत्तरप्रदेश में अखिलेश कि सरकार आई तब से मुस्लिमो का मन बहुत बढ़ गया था इसलिए ये हुआ ! कोई कह रहा था हम तो अल्पसंख्यक हैं इसलिए हमें परेशां किया जा रहा है ! काहे का मुस्लिम का मन बढ़ना भाई और काहे के तुम अल्पसंख्यक ! दोनों तरफ के लोगों को मैं जवाब देता हूँ , अगर हिम्मत है तो जबाब देकर बताना !सियासत जो चाहता है वही करते हो फिर भी सियासत को गाली देते हो ! दोनों तरफ के मूर्खों संभल जाओ और गर नहीं तो मेरा जवाब सुनो -
"
तुम्हारी माँ ने क्या कभी अपने लाल खोए हैं
घर वाले छाती पीट-पीट के क्या कभी रोए हैं
गाँव के गाँव दहशत में जाग रहे ,
कुत्ते सड़कों पे चैन की नींद सोए हैं !
कभी तेरे बहनों की राखी टूटी है , भाई की किस्मत फूटी है
नई-नवेली दुल्हन की क्या कभी ऐसे चूड़ियाँ टूटी हैं
मुझे मालुम है इन सब का उत्तर "नहीं " है ,
तभी कहते हो दोस्त की ये दंगा सही है !
(अवनीश )!






"जिसकी वफादारी के किस्से मैंने बरसों यारों में सुनाएं
आज उसे बेवफा कह भी दूँ , तो यकीं कौन करेगा
महताब देख कर उसे महबूब कह देने वाला मैं ही था
अब अगर उसे मामूली सी सूरत कह दूँ , तो यकीं कौन करेगा !
यक़ीनन यकीं वही होता है दुनियां को ,जो बरसों सुनाया जाये
गीत वही गाती सारी दुनिया , जिसे हर लब पे गुनगुनाया जाये
बिछड़ कर हम तुम अकेले -अकेले जी रहे ,हम दोनों जानते हैं
ये छोटी सी बात सरे -बज्म बताई  जाये , तो यकीं कौन करेगा !
अपने इश्क पे यकीं करूँ, या उसको झूठा कहूँ
तुझ बिन खुद को बेसब्र कहूँ , या अन्दर से टूटा-फूटा कहूँ
उलफ़त के इस मारे का जख्म भला अब कौन भरेगा
आज तुझे बेवफा कह भी दूँ तो यकीं कौन करेगा !
(आपका अवनीश )

Thursday, 18 July 2013

In the memory of 23 children who lost their lives after having mid day meal in School in Bihar and a Question from them .

           सुशासन

चारों तरफ सिर्फ सुशासन ही सुशासन है ,
नमो से भी लम्बा -चौड़ा आपका ये भाषण है ,
न रोटी मांग रहा हूँ , न किताब मांग रहा हूँ
खिला कर 23 क्यूँ मार दिया , बस इसी का हिसाब मांग रहा हूँ !
कंकाल सा शरीर , बड़ा सा दिल और दो बेबस आँखें
मिड डे मील के भरोसे दिन ,और भूखी रातें
क्या ये भी इस सुशासन में तेरे लिए ज्यादा थीं ?
गर हाँ तो फिर गलती है मुझे पैदा करना बिधाता की !
न मैं अल्लाह मानता हूँ , न मैं भगवान मानता हूँ
मैं इंसान को इंसान , और हैवान को हैवान मानता हूँ !
न मुझे मंदिर चाहिए , न मुझे मस्जिद चाहिए
मुझे दो वक़्त की रोटी , और एक वक़्त सुकून भरी नींद चाहिए !
(बिहार में स्कूल में मिड डे मौत (मिल)खाने से २३ बच्चों की मौत के बाद ये दिल अन्दर से कराह उठा है ! Laptop, Tab, shopping mall , Rangerover, Mercedes, सब बस एक करोड़ के लिए , बाकी 119 करोड़ को मौत का जहर खिला खिला कर मार दो )

Sunday, 14 July 2013



 सेक्युलर 


मैं पैगम्बर का हूँ , मैं भगवान का हूँ
मैं अब्दुल्ला का हूँ , मैं रहमान का हूँ
गालियाँ जितनी भी चाहे दे लो मुझे तुम सारे सेक्युलर
मैं अंतिम सांस तक कहूँगा , मैं बस हिंदुस्तान का हूँ !
मैं ईद की सेवई का हूँ , मैं दिवाली के पकवान का हूँ
मैं होली दशहरे का हूँ , मैं रमजान का हूँ
मुझे पता है सब नफरत फ़ैलाने की ये लम्बी साज़िश है
तभी तो कहता हूँ , मैं बस हिंदुस्तान का हूँ !
मैं पुरोहित का हूँ , मैं यजमान का हूँ ,
मैं उपनिषद का हूँ , मैं गरुड़  -पुराण का हूँ ,
मैं रामायण का हूँ , मैं कुरान का हूँ
सब ने इंसा को इंसा से दूर किया है इसलिए ,
मैं बाजारी(अशिष्ट )होकर कहता हूँ , मैं हिंदुस्तान का हूँ !
मैं काजी का हूँ , मैं पाजी का हूँ ,
मैं यीशु का हूँ , नाम मैं बुद्धा  का हूँ,
मैं शिव-बारात का हूँ , मैं शबे -रात का हूँ
सब ने कुर्सी के लिए अपनी अपनी दावें खेली हैं
मैंने अब जाकर अपनी आँखें खोली हैं !
सियासी भेड़ियों वक़्त की नब्ज़ पहचानो
इंसा की जात लो ,उसके ही मुंह से जानो ,
मैं थोड़ा सा हिन्दू , थोड़ा सा सिख ,
थोड़ा सा ईसाई , थोड़ा सा मुसलमान हूँ
मैं अपने आप में मुकम्मल हिंदुस्तान हूँ
मैं अपने आप में मुकम्मल हिंदुस्तान हूँ !
(अवनीश - आँखों को अच्छे सपने और दिल को अच्छे लोग मिलें इसी कामना के साथ शुभ रात्रि !)