अन्ना और अरविन्द
केजरीवाल की राहें अलग अलग , अन्ना ने कहा राजनीति में नहीं आऊंगा और
राजनीति में अपना नाम , अपनी फोटो कुछ भी नहीं इस्तेमाल करने दूंगा ! बात
यहीं तक रहती तो गनीमत थी , "अब तो ये भी कह दिया कि केजरीवाल और उनके गुट के लोगों को अपने मंच पे चढने भी नहीं दूंगा !" महाशय
अन्ना हजारे जी के ये तेवर देखकर व्यक्तिगत रूप से मुझे तो कहीं से नहीं
लगा कि ये राजघाट पे हर अनशन से पहले जाने वाले किसी महान गांधीवादी के
तेवर और विचार हो सकते हैं ! अब बात कि जाये मुद्दे कि - कौन सही है और कौन
गलत ? अजी ये भला मैं कैसे बता सकता हूँ और गर यहाँ बता भी दिया तो फिर
एक तरह से अपने विचार आप पे थोपने के जैसा हो जायेगा ! पर हाँ एक बात और -
अपने घर के सामने एक नाला है , कई दिनों , या सालों से उस नाले से गन्दी
पानी कि बदबू आ रही है , सारा गाँव उस नाले कि बदबू और उससे फैलने वाली
बीमारी से परेशान है पर उस नाले को साफ करने के लिए मैं गाँव के प्रधान के
खिलाफ अनशन करूँगा , सरकार को बाध्य करने कि कोशिश करूँगा कि आप चार
सरकारी नौकर भेजकर उसकी सफाई करवाए , चाहे सरकार मानने को तैयार न हो या
मानने में इतने साल लगा दे कि तब तक नाले से फैली महामारी से पूरा गाँव ही
तबाह क्यूँ न हो जाये ! और जब अगले ही साल गाँव के प्रधान का चुनाव हो तब
मैं सिर्फ उसमे इसलिए खड़ा नहीं होना चाहूँगा क्यूंकि ये प्रधान कि राजनीति ,
या सियासत का गलियारा बड़ा ही गन्दा है और उनका काम तो और भी गन्दा ! बात
समझ में आ गई हो जरुर बताना ! हजारे जी RTI हो या जनलोकपाल देशहित के किसी
भी मुद्दे पे अनशन करने को तो आप तैयार हो जाते हैं पर जब बड़े वाले
सठियाए ठाकरे और छोटे वाले पगलाए ठाकरे उत्तरप्रदेश और बिहार के लोगों पे
अंधाधुंध लाठियां और लात बरसाते हैं तब अनशन तो दूर कि बात आप एक बयान भी
नहीं देतें ! क्या ये भी आपकी राजनीति से दूर रहने कि जिद है या फिर
महाराष्ट्र और मराठी मानुष कि राजनीति और पब्लिसिटी करने कि दबी हुई
इच्छा ? अन्ना हजारे जी तो शायद जवाब न दें पर आप इसका जवाब जरुर दीजियेगा !
अपनी कुछ पंक्तियाँ :
" इंसानियत कम हो गई है , तो क्या ये जानकर इंसान बनना छोड़ दें
ख़ुशी कम हो गई है , तो क्या ये मानकर खुश होना छोड़ दें
सियासत नंगी होकर भारत माँ के सर पे नाच रही है
तो क्या सियासत से हारकर माँ से प्यार करना छोड़ दें !"
( आपके विचार सदा आमंत्रित ! आपका अवनीश !)
" इंसानियत कम हो गई है , तो क्या ये जानकर इंसान बनना छोड़ दें
ख़ुशी कम हो गई है , तो क्या ये मानकर खुश होना छोड़ दें
सियासत नंगी होकर भारत माँ के सर पे नाच रही है
तो क्या सियासत से हारकर माँ से प्यार करना छोड़ दें !"
( आपके विचार सदा आमंत्रित ! आपका अवनीश !)

अवनीश भाई !!! नमस्कार ,
ReplyDeleteहिन्दी में लिख रहे हैं,जानकर बहुत ख़ुशी हुई.
आपको याद होगा कि एक बार अन्ना हजारे बीचयू में आये थे कला संकाय के प्रेक्षागृह में और जम कर बिहार के लोगों को गलियां दी थी. उस दौरान हम लोग भी वहीँ थे. शाम का समय था.
इसी से इस आदमी की मानसिकता का पता चलता है. इन्हें महाराष्ट्र की राजनीति तक ही सिमट कर रहना चाहिए था , ऐसे गिरी मानसिकता वाले लोगों को पूरे भारत का नेतृत्व करना ही नहीं चाहिए.
जय हिन्द
I agree with you.
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