Sunday, 16 September 2012


देश के गृहमंत्री जी का एक अहले सुबह बयान आया है : जिस तरह इस देश के लोग राजीव गाँधी वाले बोफोर्स घोटाले को भूल गए उसी तरह  इस कोयले घोटाले को भी भूल जायेंगे और हमारे काले हाँथ धुल जायेंगे ! पता नहीं भूलेंगे या नहीं पर मैंने नोबेल प्राइज देने वाली कमिटी को एक पत्र अभी शाम को लिख दिया है की इस साल से" बेशर्मी के लिए  नोबेल प्राइज "नामक एक  नया कैटेगरी नोबेल प्राइज की फेहरिश्त में जोड़ दिया जाये और इसका शुभारम्भ माननीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से ही किया जाये ! हद हो गई यार , तवायफ भी कम से कम पुलिस की रेड में पकडे जाने के बाद अपना चेहरा छुपाती है (माफ़ कीजिये मेरी भाषा थोड़ी आज तल्ख़ है ) पर  इन्होने ने तो उसको भी पीछे छोड़ दिया ! कोई कार्टून बना दे तो इस देश के चर्चा चर्कवर्ती तथाकथित बुद्धिजीवी लोग उस पे राष्ट्रद्रोह का  मुकदमा दायर कर देते हैं और कोई १ करोड़ २५  लाख को  उनकी अक्ल और समझ के बारे में  भद्दा मजाक करे तो कोई नहीं इस देश में जो एक शब्द भी बोल सके ! आज एक बात का जवाब आप प्लीज  जरुर  देना : इस देश की जनता सर्बोपरी  है या इस देश का राष्ट्रीय चिन्ह और संबिधान ?" सचमुच देश एक लोकतान्त्रिक संकट के दौर से गुजर रहा है और अब हमें इन्हें बताना होगा कि :
"तेरी दीवार तेरी छत भी हिला सकता है
अपनी जिद पे आ जाये तो  पर्बत भी हिला सकता है
आपको पता नहीं है  है मेले में घुमने वाले "शिंदे" साहब
ये अवाम है अपनी जिद पे आ जाये तो हुकूमत भी हिला सकता है !"
( अब वक़्त  सिर्फ पोस्ट को देखते ही या पढ़कर like करने का नहीं रहा , आप भी अपना मुंह खोलिए और अगर मुझसे सहमत हों तो भी कुछ लिख कर बताइए और गर असहमत तो तब तो जरुर ही लिखिए , याद रखिये आपका मुझसे मतभेद हों सकता है पर मनभेद नहीं है , क्यूंकि आप सब मेरे हरदिल अज़ीज़ हैं !    आपका अवनीश  )!

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