Saturday, 29 September 2012

 रिटेल में एफ.डी.आई .(F.D.I.IN RETAIL)पिछले 15 दिनों से जब टेलीविजन या अख़बार खोल रहा हूँ  यही  विषय देखने को मिल रहा है !  10 चैनलों पे  20  संवैधानिक गुंडे (जिनको हम विभिन्न राजनितिक पार्टियों के नेता भी कह सकते हैं ),कुछ आर्थिक सलाहकार , कुछ चर्चा चक्रवर्ती और एक  न्यूज़ एंकर  सारे  मिलकर इसी बात पे बहस कर रहे होते हैं की F.D.I.IN RETAIL आने से क्या लाभ होगा और क्या हानि ! भाजपा वाले कह रहे हैं की करोड़ों लोग बेरोजगार हो जायेंगे तो महारानी एंटोनिया के सिपाहियों (कांग्रेसियों ) का कहना है की 10 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा और किसानों को भारतीय मंडी पे बाध्य होकर कम दामों में अनाज बेचने की टेंशन से मुक्ति मिलेगी  ! साहब मैं  इस विवाद में नहीं पडूंगा की फायदा क्या होगा और नुकसान क्या होगा (आप खुद अपनी राय बनाकर मुझे बता सकते हैं ) बल्कि मेरा कहना बस इतना है की सत्ता पे काबिज़ देश के भारत भाग्य बिधाताओं , अब और  कितना किसानों का उपहास करोगे ! क्या अब दलित राजनीती , मुस्लिम वोट और सेकुलरिज्म की राजनीती, बंगलादेश से आये 25  लाख अवैध वोटबैंक  की गन्दी राजनीती से आपका मन इतना उब गया है ,जो अब किसानों के बारे में बोलकर उनकी दुखती रग पे हाँथ रखना चाहते हो  ! बिदर्भ के किसानों  की आत्महत्या का इतना घिनौना मजाक तो कम से कम आप दोनों एक साथ मिलकर न बनाओ की आप ये कहना शुरू  कर दो की इस देश के किसानों के लिए भी हम सोचा करते हैं और वो भी सिर्फ इसलिए क्यूंकि  2013 के विधानसभा चुनाव और २०१४  का लोकसभा चुनाव आपको  दिख रहा है ! इस देश की कुर्सी पे चाहे जो भी बैठता है पहले धोती वाले पंडित जी हों  या आज के पगड़ी वाले सरदार जी दोनों एक ही भाषा बोलते है पर अलग अलग वक़्त पर ! धोती वाले पंडित जी (अटल बिहारी वाजपई) ने भी अपने समय में  इसी F.D.I.IN RETAIL   की वकालत की थी  जिसकी आज महारानी के मौन सेनापति जी कर रहे हैं ! पंडित जी को चाहे  घुटने में दर्द होता है या महारानी को पेट में दर्द आप दोनों को हम पे इतना भरोसा नहीं है की आप अपना शरीर  हमारे हवाले छोड़ दें  और अमेरिका भागते हैं  तो फिर क्यूँ न  आपको अमेरिका के आटे और चावल पे भरोसा हो ! हो सकता है   चमचमाती polythene  में packed rapper  लगा हुआ अमेरिकन    दाल आपके चेहरे पे  ज्यादा लालिमा लाये जो शायद इस देश के किसान अपने खून और पसीने से उगाये गए अरहर दाल से अब तक  न ला पायें ! साहब बहुत मुश्किल है  इस देश में पक्ष और विपक्ष को समझना ! छोडिये किसानों को साहब अपना माल बनाइये , देखिये कहीं और लोहा , कोयला , थोरियम आपका इंतज़ार कर रहा होगा , कर दीजिये सबकी नीलामी और मरने दीजिये किसानों को ! रोने को मन करता है और बनारस के  बेनियाबाग के मुशायरे में जब गया था तो वहां कही हुई किसी शायर की चार  पंक्तियाँ  बरबस जुबान पे आ जाती है
" अगर ये सियासी लोग नदी के किनारे बस जातें
तो हम प्यासे बूंद बूंद को तरस जाते
वो तो शुक्र है बादलों पे इनका बस नहीं चलता
वरना सारे बादल इनके खेतों में बरस जातें !
(सुखद भारत की कल्पना में शुभ रात्रि , आपका अवनीश !)

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